Unit I 5. Problems Associated with Soil and Their Remedies in India

जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर

भारत का भूगोल (Geography of India)

प्रकरण: Problems Associated with Soil and Their Remedies in India

भारत में मृदा से संबंधित समस्याएँ एवं उनके उपचारात्मक उपाय


1. भूमिका

मृदा भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। देश की कृषि, खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, वनस्पति तथा पारिस्थितिक संतुलन प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मृदा पर निर्भर हैं। भारत में जलवायु, स्थलाकृति, चट्टानी संरचना और वनस्पति की विविधता के कारण विभिन्न प्रकार की मृदाएँ पाई जाती हैं।

वर्तमान समय में वनों की कटाई, अतिचराई, अत्यधिक कृषि, असंतुलित सिंचाई, रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग, औद्योगीकरण तथा नगरीकरण के कारण भारत की मृदा अनेक समस्याओं से प्रभावित हो रही है।

इन समस्याओं के कारण मृदा की उर्वरता, उत्पादकता, संरचना और जैविक गुणवत्ता में गिरावट आती है।



2. मृदा समस्या का अर्थ

मृदा के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों में ऐसा प्रतिकूल परिवर्तन जिससे उसकी उत्पादकता, उर्वरता, जल धारण क्षमता तथा पारिस्थितिक उपयोगिता कम हो जाए, उसे मृदा समस्या या मृदा क्षरण की समस्या कहा जा सकता है।

सरल रूप में:

मृदा की गुणवत्ता में गिरावट = मृदा समस्या



3. भारत में मृदा से संबंधित प्रमुख समस्याएँ

भारत में मृदा की प्रमुख समस्याएँ निम्न हैं—

1. मृदा अपरदन (Soil Erosion)

2. मृदा उर्वरता में कमी (Decline in Soil Fertility)

3. लवणीयता एवं क्षारीयता (Salinity and Alkalinity)

4. जलभराव (Waterlogging)

5. मृदा अम्लीकरण (Soil Acidification)

6. मरुस्थलीकरण (Desertification)

7. मृदा प्रदूषण (Soil Pollution)

8. मृदा में जैविक पदार्थों की कमी

9. अत्यधिक एवं असंतुलित रासायनिक उर्वरक उपयोग

10. अतिचराई एवं वनस्पति आवरण में कमी




4. मृदा अपरदन (Soil Erosion)

अर्थ

मृदा की ऊपरी एवं उपजाऊ परत का जल, वायु अथवा अन्य प्राकृतिक शक्तियों द्वारा एक स्थान से हटकर दूसरे स्थान पर चले जाना मृदा अपरदन कहलाता है।

यह भारत की सबसे गंभीर मृदा समस्याओं में से एक है।

मृदा अपरदन के प्रमुख प्रकार

(A) जल अपरदन

भारत में सबसे व्यापक प्रकार।

इसके प्रमुख रूप:

परत अपरदन (Sheet Erosion)

अवनालिका अपरदन (Rill Erosion)

गली अपरदन (Gully Erosion)


(B) वायु अपरदन

शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में प्रमुख है।

विशेषकर:

पश्चिमी राजस्थान

गुजरात

हरियाणा

पंजाब के कुछ शुष्क क्षेत्र


मृदा अपरदन के कारण

वनों की कटाई

अतिचराई

गलत कृषि पद्धतियाँ

ढाल पर बिना संरक्षण के खेती

तेज वर्षा

बाढ़

तेज हवाएँ

खनन

सड़क एवं निर्माण गतिविधियाँ


प्रभाव

उपजाऊ ऊपरी मृदा का नुकसान

कृषि उत्पादन में कमी

जलाशयों में गाद जमा होना

नदियों में सिल्टेशन

भूमि की उत्पादकता में कमी

मरुस्थलीकरण को बढ़ावा



5. मृदा अपरदन के उपचार एवं नियंत्रण

कृषि संबंधी उपाय

1. समोच्च जुताई (Contour Ploughing)
ढाल के समानांतर जुताई करके जल बहाव को कम किया जाता है।

2. सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming)
पर्वतीय क्षेत्रों में ढाल को सीढ़ियों में विभाजित किया जाता है।

3. पट्टीदार खेती (Strip Cropping)
फसलों को पट्टियों में उगाकर जल एवं वायु के प्रभाव को कम किया जाता है।

4. फसल चक्र (Crop Rotation)
विभिन्न फसलों को क्रम से उगाकर मृदा की गुणवत्ता बनाए रखी जाती है।

जैविक उपाय

वनीकरण

कृषि वानिकी

घास लगाना

चारागाह विकास

shelter belts

windbreaks


यांत्रिक उपाय

Check dams

Contour bunding

Gully plugging

छोटे जलाशय

जल निकास संरचनाएँ




6. मृदा उर्वरता में कमी

मृदा की फसल उत्पादन क्षमता में लगातार कमी आना मृदा उर्वरता ह्रास कहलाता है।

प्रमुख कारण

लगातार एक ही फसल उगाना

पोषक तत्वों का अत्यधिक दोहन

जैविक खाद की कमी

मृदा अपरदन

असंतुलित रासायनिक उर्वरक

फसल अवशेषों को जलाना

अत्यधिक सिंचाई


प्रभाव

कृषि उत्पादकता में कमी

उत्पादन लागत में वृद्धि

पोषक तत्वों का असंतुलन

किसानों की आय पर प्रभाव


समाधान

1. मृदा परीक्षण (Soil Testing)


2. संतुलित उर्वरक प्रयोग


3. जैविक खाद एवं कम्पोस्ट


4. हरी खाद (Green Manuring)


5. जैव उर्वरक (Bio-fertilizers)


6. फसल चक्र


7. दलहनी फसलों को फसल चक्र में शामिल करना


8. फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन




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7. लवणीयता एवं क्षारीयता

भारत के सिंचित एवं शुष्क क्षेत्रों में यह महत्वपूर्ण समस्या है।

लवणीय मृदा

जब मृदा में घुलनशील लवणों की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है तो उसे लवणीय मृदा कहते हैं।

क्षारीय/सोडिक मृदा

जब मृदा में सोडियम की मात्रा अधिक हो जाती है तथा मृदा की संरचना एवं उत्पादकता प्रभावित होती है, तो इसे क्षारीय या सोडिक मृदा कहा जाता है।

प्रमुख क्षेत्र

राजस्थान

पंजाब

हरियाणा

उत्तर प्रदेश

गुजरात

महाराष्ट्र

तटीय क्षेत्र


कारण

अत्यधिक सिंचाई

खराब जल निकास

उच्च वाष्पीकरण

लवणयुक्त सिंचाई जल

समुद्री जल का प्रभाव

भूजल स्तर में वृद्धि



8. लवणीय एवं क्षारीय मृदा के समाधान

1. उचित जल निकास

अतिरिक्त जल एवं घुले हुए लवणों को बाहर निकालने के लिए Drainage System विकसित किया जाए।

2. जिप्सम का प्रयोग

सोडिक/क्षारीय मृदाओं के सुधार में जिप्सम (Gypsum) का उपयोग किया जाता है।

3. सिंचाई प्रबंधन

आवश्यकता के अनुसार सिंचाई

अत्यधिक सिंचाई से बचाव

उचित गुणवत्ता वाले सिंचाई जल का उपयोग


4. नमक सहनशील फसलें

ऐसी फसलों का चयन जो लवणीय परिस्थितियों को सहन कर सकें।

5. जैविक खाद

गोबर की खाद, कम्पोस्ट एवं अन्य जैविक पदार्थों से मृदा की संरचना सुधारना।




9. जलभराव (Waterlogging)

जब मृदा में पानी की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है और भूमिगत जल स्तर इतना ऊपर आ जाता है कि पौधों की जड़ों का विकास प्रभावित होने लगे, तो इसे जलभराव कहते हैं।

प्रमुख क्षेत्र

सिंचाई परियोजनाओं के आसपास तथा नहर कमांड क्षेत्रों में यह समस्या देखी जाती है।

कारण

अत्यधिक सिंचाई

नहरों से रिसाव

खराब प्राकृतिक जल निकास

भूजल स्तर का ऊपर उठना

जल निकासी की अपर्याप्त व्यवस्था


प्रभाव

मृदा में वायु की कमी

पौधों की जड़ों को ऑक्सीजन की कमी

कृषि उत्पादकता में कमी

लवणीयता बढ़ना

भूमि का अनुपयोगी होना


समाधान

1. वैज्ञानिक सिंचाई प्रबंधन


2. नहरों की लाइनिंग


3. सतही जल निकास


4. भूमिगत drainage


5. जलभराव वाले क्षेत्रों में उचित फसल चयन


6. भूजल स्तर का नियंत्रण





10. मृदा अम्लीकरण (Soil Acidification)

मृदा के pH में अत्यधिक कमी आने से मृदा अम्लीय हो जाती है।

भारत में प्रमुख क्षेत्र

अधिक वर्षा वाले क्षेत्र, विशेषकर:

पूर्वोत्तर भारत

पश्चिमी घाट

पूर्वी भारत के कुछ भाग


कारण

अत्यधिक वर्षा

पोषक तत्वों का निक्षालन

अम्लीय उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग

अम्लीय मूल शैल


प्रभाव

कुछ पोषक तत्वों की उपलब्धता कम होना

फसल उत्पादन में कमी

एल्युमिनियम जैसी तत्वों की विषाक्तता की संभावना


समाधान

Liming — चूना डालना

इसके अतिरिक्त:

संतुलित उर्वरक उपयोग

जैविक खाद

उचित फसल चयन

मृदा परीक्षण



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11. मरुस्थलीकरण (Desertification)

उपजाऊ एवं उत्पादक भूमि का क्रमशः ऐसी स्थिति में पहुँचना जिसमें उसकी जैविक और आर्थिक उत्पादकता कम हो जाती है, मरुस्थलीकरण कहलाता है।

भारत में प्रमुख प्रभावित क्षेत्र

पश्चिमी राजस्थान

गुजरात

हरियाणा

पंजाब के कुछ भाग

दक्कन के शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क क्षेत्र


कारण

अतिचराई

वनों की कटाई

वायु अपरदन

जल का अति-दोहन

अनुचित कृषि

जलवायु परिवर्तन

प्राकृतिक वनस्पति का विनाश


समाधान

1. वनीकरण


2. Shelter belts


3. Windbreaks


4. नियंत्रित चराई


5. वर्षा जल संचयन


6. सूखा-सहिष्णु फसलें


7. जल संरक्षण


8. कृषि वानिकी


9. चारागाह विकास




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12. मृदा प्रदूषण (Soil Pollution)

मृदा में हानिकारक रसायनों, भारी धातुओं, औद्योगिक अपशिष्टों, प्लास्टिक एवं अन्य प्रदूषकों का अत्यधिक संचय मृदा प्रदूषण कहलाता है।

प्रमुख स्रोत

रासायनिक उर्वरक

कीटनाशक

औद्योगिक अपशिष्ट

नगरों का ठोस कचरा

प्लास्टिक

ई-कचरा

सीवेज

खनन


प्रभाव

मृदा की उर्वरता में कमी

खाद्य पदार्थों में विषैले तत्वों का प्रवेश

भूजल प्रदूषण

मृदा जीवों पर प्रभाव

मानव स्वास्थ्य पर अप्रत्यक्ष प्रभाव


समाधान

जैविक खेती

Integrated Pest Management

वैज्ञानिक ठोस अपशिष्ट प्रबंधन

औद्योगिक अपशिष्ट का उपचार

प्लास्टिक उपयोग में कमी

जैव उर्वरक

रासायनिक पदार्थों का नियंत्रित उपयोग



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13. मृदा में जैविक पदार्थों की कमी

मृदा में Organic Matter/Humus की कमी भारत के अनेक कृषि क्षेत्रों में मृदा स्वास्थ्य की समस्या है।

कारण

फसल अवशेषों को जलाना

पशुधन आधारित जैविक खाद का कम प्रयोग

लगातार खेती

जैविक पदार्थों का अपरदन


समाधान

कम्पोस्ट

वर्मी-कम्पोस्ट

गोबर खाद

हरी खाद

फसल अवशेषों को मृदा में मिलाना

कृषि वानिकी



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14. अत्यधिक रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक उपयोग

हरित क्रांति के बाद भारत में रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, लेकिन असंतुलित एवं अत्यधिक उपयोग से कुछ क्षेत्रों में मृदा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

समस्याएँ

पोषक तत्वों का असंतुलन

मृदा जैव विविधता में कमी

अम्लीकरण की संभावना

जल एवं मृदा प्रदूषण

उत्पादन लागत में वृद्धि


समाधान

Integrated Nutrient Management — INM

इसमें:

रासायनिक उर्वरक + जैविक खाद + जैव उर्वरक

का संतुलित उपयोग किया जाता है।


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15. भारत में मृदा संरक्षण के प्रमुख उपाय

1. समोच्च जुताई

ढाल के लंबवत/समोच्च रेखाओं के अनुसार कृषि करने से जल के बहाव की गति कम होती है।

2. सीढ़ीदार खेती

पर्वतीय क्षेत्रों में ढाल को सीढ़ियों में बदलकर मृदा एवं जल संरक्षण किया जाता है।

3. पट्टीदार खेती

विभिन्न फसलों की पट्टियाँ बनाकर अपरदन कम किया जाता है।

4. वनीकरण

पेड़ों की जड़ें मृदा को बाँधती हैं तथा वर्षा जल के बहाव को कम करती हैं।

5. कृषि वानिकी

फसल एवं वृक्षों का संयुक्त उत्पादन मृदा संरक्षण में सहायक है।

6. Shelter Belts

शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में वृक्षों की पट्टियाँ तेज हवाओं की गति कम करती हैं।

7. जल संरक्षण

Check dams

Farm ponds

Rainwater harvesting

Watershed management


8. नियंत्रित चराई

अत्यधिक चराई से प्राकृतिक वनस्पति समाप्त होती है, इसलिए चराई का वैज्ञानिक प्रबंधन आवश्यक है।


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16. Watershed Management की भूमिका

जलागम प्रबंधन (Watershed Management) मृदा एवं जल दोनों के संरक्षण की एक समग्र पद्धति है।

इसमें:

वर्षा जल → संग्रहण → जल का धीमा बहाव → भूजल पुनर्भरण → मृदा संरक्षण

का समन्वित प्रबंधन किया जाता है।

प्रमुख लाभ

मृदा अपरदन में कमी

भूजल पुनर्भरण

कृषि उत्पादकता में वृद्धि

जल उपलब्धता में सुधार

भूमि क्षरण में कमी



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17. समस्या और समाधान — परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तालिका

समस्या प्रमुख कारण प्रमुख उपचार

मृदा अपरदन जल, वायु, वनों की कटाई वनीकरण, contour farming
उर्वरता ह्रास पोषक तत्वों का अति-दोहन फसल चक्र, जैविक खाद
लवणीयता अधिक सिंचाई, खराब drainage drainage, leaching
क्षारीयता सोडियम की अधिकता जिप्सम
जलभराव अत्यधिक सिंचाई, रिसाव drainage, नियंत्रित सिंचाई
अम्लीकरण निक्षालन, अम्लीय उर्वरक liming
मरुस्थलीकरण अतिचराई, वायु अपरदन shelter belts, वनीकरण
मृदा प्रदूषण रसायन, औद्योगिक कचरा वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन
जैविक पदार्थों की कमी अवशेष जलाना compost, green manure
पोषक असंतुलन असंतुलित उर्वरक INM, soil testing



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18. भारत में मृदा संरक्षण के लिए समन्वित दृष्टिकोण

मृदा समस्याओं का समाधान किसी एक उपाय से संभव नहीं है। इसके लिए Integrated Soil Management आवश्यक है।

समन्वित रणनीति

मृदा परीक्षण
↓
उचित फसल चयन
↓
संतुलित उर्वरक
↓
जैविक पदार्थों में वृद्धि
↓
उचित सिंचाई एवं जल निकास
↓
मृदा एवं जल संरक्षण
↓
वनीकरण एवं कृषि वानिकी
↓
सतत भूमि उपयोग


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19. भारत में मृदा संरक्षण की आवश्यकता

मृदा संरक्षण आवश्यक है क्योंकि:

1. मृदा निर्माण अत्यंत धीमी प्रक्रिया है।


2. कृषि उत्पादन मृदा पर निर्भर है।


3. खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के लिए आवश्यक है।


4. ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार है।


5. जल संरक्षण में सहायक है।


6. जैव विविधता को बनाए रखती है।


7. मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण को रोकती है।


8. सतत विकास के लिए आवश्यक है।




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20. परीक्षा में उत्तर लिखने की आदर्श शैली

यदि प्रश्न हो:

> “भारत में मृदा से संबंधित प्रमुख समस्याओं का वर्णन करते हुए उनके उपचारात्मक उपायों की विवेचना कीजिए।”



तो उत्तर इस क्रम में लिखें:

भूमिका

मृदा का महत्व एवं समस्या का परिचय।

मुख्य भाग

1. मृदा अपरदन → कारण → प्रभाव → समाधान

2. उर्वरता ह्रास → कारण → प्रभाव → समाधान

3. लवणीयता/क्षारीयता → कारण → समाधान

4. जलभराव → कारण → समाधान

5. अम्लीकरण → कारण → समाधान

6. मरुस्थलीकरण → कारण → समाधान

7. मृदा प्रदूषण → कारण → समाधान

8. जैविक पदार्थों की कमी → समाधान

अंत में

समन्वित मृदा संरक्षण + सतत कृषि + निष्कर्ष।


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21. संभावित परीक्षा प्रश्न

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1. भारत में मृदा से संबंधित प्रमुख समस्याओं की विवेचना करते हुए उनके उपचारात्मक उपाय बताइए।


2. भारत में मृदा अपरदन के कारण, प्रकार एवं नियंत्रण के उपायों की व्याख्या कीजिए।


3. भारत में मृदा उर्वरता ह्रास के कारण एवं समाधान समझाइए।


4. भारत में लवणीय एवं क्षारीय मृदाओं की समस्या तथा उनके सुधार के उपायों की विवेचना कीजिए।


5. जलभराव एवं मृदा लवणीयता की समस्या का वर्णन कीजिए।


6. भारत में मरुस्थलीकरण के कारण एवं नियंत्रण के उपायों की चर्चा कीजिए।


7. मृदा संरक्षण में जलागम प्रबंधन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।



लघु उत्तरीय प्रश्न

मृदा अपरदन क्या है?

खादर एवं बांगर में अंतर बताइए।

जलभराव क्या है?

मृदा अम्लीकरण क्या है?

लवणीय मृदा से क्या तात्पर्य है?

जिप्सम का उपयोग किस मृदा समस्या के समाधान में किया जाता है?

Shelter Belt क्या है?

मृदा संरक्षण में contour farming का क्या महत्व है?

मरुस्थलीकरण क्या है?

INM क्या है?



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22. निष्कर्ष

भारत की मृदा समस्याएँ केवल कृषि की समस्या नहीं हैं, बल्कि वे पर्यावरण, अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और सतत विकास से सीधे जुड़ी हुई हैं। मृदा अपरदन, उर्वरता ह्रास, लवणीयता, क्षारीयता, जलभराव, अम्लीकरण, मरुस्थलीकरण और प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए मृदा एवं जल संरक्षण, वैज्ञानिक सिंचाई, संतुलित उर्वरक उपयोग, जैविक खाद, फसल चक्र, वनीकरण, कृषि वानिकी, नियंत्रित चराई और जलागम प्रबंधन को एकीकृत रूप से अपनाना आवश्यक है।

⭐ परीक्षा में याद रखने योग्य सूत्र

“अपरदन रोकें → उर्वरता बढ़ाएँ → जल बचाएँ → लवणीयता नियंत्रित करें → जैविक पदार्थ बढ़ाएँ → प्रदूषण घटाएँ → सतत कृषि अपनाएँ।”

अर्थात — स्वस्थ मृदा → स्वस्थ कृषि → खाद्य सुरक्षा → सतत विकास।







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